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Famous personality (science) सतीश धवन पद्म विभूषण प्राप्त भारत के सबसे सफल वैज्ञानिक में से एक जिन्होंने ISRO और IISC जैसे बड़े संस्थानों के एक साथ एक ही टाइम में प्रमुख रहे और कामयाब बनाया

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भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को दुनिया भर में फेमस करने वाले और अब्दुल कलाम के गुरु सतीश धवन का जन्म को 25 सितम्बर 1920 श्रीनगर में हुआ।

सतीश धवन जी ने लाहौर से गणित और भौतिक शास्त्र में बी.ए.की , फिर अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए. उसके बाद मेकानिकल इंजीनियरिंग में बी.ई, 1945 की , उसके बाद मिनेसोटा विश्वविद्यालय, मिनियापोलिस से ऐरोस्पेस में इंजीनियरिंग में इंजिनयरिंग की , फिर 1951 में कैलिफ़ोर्निया इन्स्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नॉलोजी वैमानिकी और गणित में पी.एच.डी की।

अच्छे गुरु को पाने के लिए विनर्मता से प्रयास करते रहे

कैलिफ़ोर्निया इन्स्टिट्यूट में एक टीचर हान्स लीपमैन.का इंजीनियरिंग की दुनिया में बड़ा नाम था.सतीश धवन भी इनसे मिलने के इच्छुक थे , लीपमैन एक भारतीय युवक मिलना नहीं चाहते थे क्यूंकि लीपमैन अपने पिछले भारतीय छात्र से बहुत निराश थे. वो छात्र टूल्स इस्तेमाल करना और अपने हाथों से काम करना अपनी तौहीन समझता था. जिसके चलते लीपमैन भारतीयों से खासे खफा थे. हालांकि सतीश जी ने प्रयास जारी रखा ,कई बार कोशिशें की. और अंत में लीपमैन सतीश जी के समर्पण को देखते हुए उन्हें लेने के लिए तैयार हो गए. सतीश जी ने छात्र और गुरु का ये रिश्ता बहुत शिद्दत से निभाया जिससे उनका ये रिश्ता सारी उम्र कायम रहा.

लीपमैन ने हाथों से काम करना सिखाया था. और इन्हीं हाथों की बदौलत सतीश धवन ने भारत को आसमान तक पहुंचा दिया।

सतीश धवन ने ISRO को इतनी उंचाईओं तक पहुंचा दिया की भारत सरकार ने सैटेलाइट लॉन्चिंग पैड का नाम सतीश जी नाम पर रख दिया जब भी कोई सैटेलाइट लॉन्च होता है आपको सतीश धवन का नाम अवश्य सुनाई देगा। . ISRO की स्थापना विक्रम साराभाई ने की थी, धवन ने उन्हें एक तेज़ रफ़्तार दौड़ में बदला. इस एक संस्थान में उनका योगदान ही उन्हें भारत के महान वैज्ञानिकों की श्रेणी में शामिल कर देता है. लेकिन धवन मल्टीटैलेंटेड व्यक्ति थे , वे एक ही समय पर वो ISRO और IISC जैसे दो बड़े संस्थानों के मुखिया थे। धवन कई बार हवाई उड़ान की बारीकियों को समझाते समझाते शेक्सपियर पर भी बोल देते थे और कई बार कभी वक्त मिलने पर बर्ड सैंक्चुअरी में पक्षियों की उड़ान निहारा करते थे. और उन्हें देखते हुए भी ऐरोडायनामिक्स का पूरा लेखा जोखा लिख दिया करते थे.

देश को डॉक्टर कलाम देने का श्रेय भी धवन जी को जाता है. आओ जानते है भारत के सबसे महान वैज्ञानिक सतीश धवन की कहानी।

ISRO से पहले IISC का जिम्मा

साल 1951 में जब डॉक्टर धवन भारत वापिस आए तो उनकी जिंदगी के प्लान्स में भारत में नए इंजीनियर तैयार करना था. उसी साल उन्हें इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस, IISC में छात्रों को पढ़ाने का जिम्मा दिया गया , IISC में नियुक्ति का भी एक किस्सा है. धवन की PHD ट्रेनिंग गणित और फिजिक्स में थी. इसलिए जब उन्होंने IISC में अप्लाई किया, वहां के निदेशक ने उन्हें ईलाहबाद विश्वविद्यालय भेज दिया, ये कहते हुए कि उनके ज्ञान का वहां बेहतर उपयोग होगा. ईलाहबाद में उन्हें इंटरव्यू के लिए बुलाया गया. धवन एक डेस्क पर बैठे थे. एक के बाद एक प्रोफ़ेसर आकर उनसे सवाल पूछ रहे थे. उनमें से एक ने धवन के सामने एक ग्राफ रखा, और उनसे ग्राफ पर बनी रेखाओं को नाम देने को कहा. धवन कुछ देर बैठे सोचते रहे. इंटरव्यू लेने वाले को लगा धवन को इसका जवाब नहीं पता. उसने धवन से तल्ख़ आवाज में बात की , धवन चुपचाप सुनते रहे. जब सामने वाले की बातें ख़त्म हो गई. धवन ने सामने ग्राफ उल्टा कर दिया और महोदय को समझाया कि किताब से ग्राफ कॉपी करते हुए उन्होंने उसे उलटा छाप दिया है., उन्होंने उलटे ग्राफ को भी पहचान लिया इंटरव्यू लेने वाला भी हैरान था

लीडरशिप की और इंसान को पहचानने की क़ाबलियत

धवन जब IISC में पढ़ाते थे,तो उनके घर में एक नौकर काम करता था. बी रमैया, अपने एक्सपेरिमेंट्स के लिए धवन को लकड़ी के कुछ सेट अप बनाने होते थे. इस काम को वो अपने हाथ से ही करते थे, और रमैया इसमें उनकी मदद किया करता था. उसकी की प्रतिभा देखते हुए धवन ने उसको अपने एक्सपेरिमेंट्स का हिस्सा बना लिया और आगे चलकर इन्हीं रमैया के बेटे ने एलन मस्क की कंपनी स्पेस-एक्स में बतौर इंजीनियर नौकरी की. कुछ सैलून की मेहनत के बाद 1962 में धवन IISC के निदेशक नियुक्त हो गए।. अपने कार्यकाल में उन्होंने IISC में साइंस, मॉलीक्यूलर बायोफिजिक्स, सॉलिड स्टेट केमिस्ट्री, इकॉलॉजी और एटमॉसफेरिक साइंस जैसे विषयों में नए शोध कार्यक्रम शुरू किए संस्था को उच्चतम शिखर तक ले गए

ISRO की कमान संभालने का मौका आया

धवन कुछ शोध कार्य और करना चाहते थे लेकिन IISC की जिम्मेवारी की वजह से समय नहीं मिल रहा था ,1971 में सतीश धवन ने आईआईएससी से थोड़ा सा विराम लिया और वापस कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी में जा कर नए शोध कार्य में रम गए, लेकिन उसी साल दिसंबर में भारत के लिए एक बुरी खबर आई. अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक विक्रम साराभाई की मृत्यु हो गई. ISRO के निदेशक होने के साथ-साथ साराभाई प्रधानमंत्री के साइंटिफिक एडवाइजर भी थे।भारत की प्रधान मंत्री के प्रधान सचिव पीएन हक्सर ने इंदिरा को ISRO के नए हेड के लिए डॉक्टर धवन का नाम सुझाया. वरिष्ठ वैज्ञानिक VP बालगंगाधरन अपनी किताब में लिखते हैं कि शुरुआत में इंदिरा धवन को ये ऑफर नहीं देना चाहती थीं. क्यूंकि कुछ वक्त पहले धवन को काउंसिल ऑफ साइंटिफिक रिसर्च, CSIR के डायरेक्टर जनरल, और रक्षा मंत्री के सलाहकार का पद ऑफर किया था, जिसे धवन ने ठुकरा दिया था क्यूंकि धवन अफसरशाही में नहीं फसना चाहते थे ,जिसके चलते इंदिरा धवन से नाराज चल रही थी. अंत में इंदिरा के सलाहकार प्रोफ़ेसर MGK मेनन ने इंदिरा को धवन के नाम पर राजी कर लिया क्यूंकि उस समय धवन से ज्यादा क़ाबलियत का कोई वैज्ञानिक नहीं था . इंदिरा ने धवन से फोन पर बात की. धवन पद संभालने के लिए राजी तो हो गए, लेकिन साथ में उनकी कुछ शर्ते भी रख दी पहली - वे IISC के निदेशक पद भी ISRO के साथ सँभालते रहेंगे। दूसरी- अंतरिक्ष अभियान का मुख्यालय अहमदाबाद से बेंगलुरु शिफ्ट किया जाए.जिससे अफसरशाही की दखलंदाजी काम रहे तीसरी- लौटने से पहले उन्हें अमेरिका में वह शोध कार्य पूरा करने दिया जाए

इंदिरा तीनों शर्तों पर राजी हो गई. इस तरह 1972 में डॉक्टर धवन भारत लौटे और ISRO के तीसरे निदेशक बने।

ISRO के निदेशक रहते हुए उन्होंने भारत के स्पेस प्रोग्राम को रफ़्तार दी. साथ ही ये सुनिश्चित किया कि ISRO एटॉमिक कमीशन से अलग रहे. ISRO को ब्यूरोक्रेसी से दूर रखने के लिए वो सैटेलाइट प्रोग्राम बैंगलोर लेकर आए. ISRO को रक्षा मंत्रालय से दूर रखने का ये फायदा हुआ कि भारत को फ्रांस आदि देशों से तकनीकी सहायता मिल पाई. इसी दौर में उन्होंने भारत के लिए अगली पंक्ति के वैज्ञानिकों को तैयार किया. इनमें से एक भारत के पूर्व राष्ट्रपति और मिसाइल मैन, डॉक्टर अब्दुल कलाम भी थे. डॉक्टर कलाम, धवन के साथ काम करने के दौरान का एक किस्सा बताते हैं.

अब्दुल कलाम ने सतीश धवन से जब लीडरशिप का सबक सिखाया

10 अगस्त, 1979 को SLV-3 के जरिए 40 किलो की सैटेलाइट लांच की जाने थी. डॉक्टर कलाम इस प्रोजेक्ट के डॉयरेक्टर थे. डॉक्टर कलाम के अनुसार लॉन्च होने से सिर्फ़ चंद सेकेंड पहले अचानक सामने कम्प्यूटर की स्क्रीन पर कलाम को लॉन्च कैंसिल करने का संदेश दिखाई दिया. आखिरी निर्णय डॉक्टर कलाम को लेना था. उन्होंने लॉन्चिंग जारी रखने का फैसला लिया और सैटेलाइट सीधा बंगाल की खाड़ी में जा गिरा. कलाम बताते हैं कि ईधन सिस्टम में कुछ रिसाव हो रहा था, लेकिन उन्हें लगा इसका कोई असर नहीं होगा.लेकिन उनका अनुमान ग़लत साबित और ये प्रोजेक्ट फेल हो गया। .कलाम का ये पहला ही सैटेलाइट लॉन्च था और वो फेल गया था। अगले दिन प्रेस कॉन्फ्रेंस में सब को जवाब देना था और कलाम बताते हैं कि उन्हें समझ ही नहीं आ रहा था की प्रेस में देश-विदेश के पत्रकार को क्या जवाब देंगे। लेकिन सतीश धवन वहां प्रेस का सामना करने के लिए वो खुद आगे आए और कहा, “हम असफल रहे! लेकिन मुझे अपनी टीम पर बहुत भरोसा है और मुझे विश्वास है कि अगली बार हम निश्चित रूप से सफल होंगे.” कलाम बताते हैं कि इस बात से वो बहुत हैरान हुए. धवन ने असफलता का दोष अपने सर लेते हुए अपनी टीम को बचा लिया. इसके बाद 18 जुलाई, 1980 को एक बार फिर से लॉन्च की कोशिश की गई.और ये कोशिश सफल रही. इस बार धवन ने डॉक्टर कलाम को आगे करते हुए उन्हें प्रेस के सामने भेजा. कलाम बताते हैं कि लीडरशिप के मामले में धवन हमेशा नज़ीर पेश किया करते थे. हर सफलता का श्रेय टीम को मिलता था, जबकि असफलता वो अपने कंधों पर ले लिया करते थे.

सिर्फ उच्च स्तर के वैज्ञानिक ही नहीं एक उच्च स्तर के इंसान भी

डॉक्टर कलाम के ही अनुसार हरिकोटा में सैटेलाइट लॉन्च सेंटर का निर्माण होना था. इस काम के लिए साइट और बिल्डिंग्स का प्लान डॉक्टर धवन को दिखाया गया. उन्होंने पाया कि इस काम के लिए उस इलाक़े के 10 हज़ार पेड़ों को काटा जाना था. धवन इसके लिए क़तई तैयार नहीं थे. कलाम लिखते हैं कि धवन को पेड़ों और पक्षियों से बहुत प्यार था. हर सुबह वो जंगल जाते थे, और वहां पक्षियों को देखा करते थे. हर किसी को पता था कि इस दौरान उनसे काम के लिए सम्पर्क ना किया जाए. पक्षियों की उड़ान से वो बहुत प्रभावित होते थे वहां से उनको जिंदगी की प्रेरणा मिलती थी , इस विषय पर उन्होंने ‘हाउ बर्ड्स फ्लाई’ नाम की एक किताब भी लिखी थी। जिसमें पक्षियों की उड़ान के ऐरोडायनामिक्स को समझाया गया था. बहरहाल श्रीहरिकोटा में पेड़ों को बचाने के लिए धवन ने टीम की दो घंटे तक मीटिंग की. और ज़्यादा से ज़्यादा पेड़ों को बचाने में कामयाब रहे. जो पेड़ काटे गए उनके बदले एक दूसरी जगह पर पेड़ लगाए गए. कलाम बताते हैं कि पहली बार ISRO के डायरेक्टर के ऑफिस से एक ऑफिसियल आर्डर जारी किया गया, जिसमें लिखा था,

“सीधे चेयरमैन के आदेश के बिना काम्प्लेक्स से एक पेड़ भी नहीं काटा जाएगा”

1984 तक धवन इसरो के निदेशक रहे. इस दौरान भारत ने सैटेलाइट लॉन्च में बहुत तेज और सबसे ज्यादा तरक्की की और उस समय रिमोट सेंसिंग, संचार, मौसम आदि क्षेत्रों में अपनी शक्ति को बढ़ाया ,INSAT, PSLV, IRS जैसे कई नए सिस्टम तैयार हुए. जिन्होंने भारत को स्पेस रिसर्च की रेस में दुनिया के अग्रणी देशों में ला खड़ा किया. कमाल की बात कि इस दौरान उन्होंने ISRO से कोई तनख्वाह भी स्वीकार नहीं की. मात्र 1 रुपया प्रतीक के रूप में लेते रहे. क्योंकि उनको लगता था की IISC से जब तनख्वाह से काम चल रहा है तो 2 तनख्वाह किस लिए लेनी। साल 2002 में 3 जनवरी को डॉक्टर धवन का निधन हो गया था. जीते जी उन्हें पद्म भूषण, पद्म विभूषण जैसे नागरिक सम्मानों से नवाज़ गया. वहीं उनकी मृत्यु के बाद उनके सम्मान में श्रीहरिकोटा आंध्र प्रदेश में स्थित सैटेलाइट लॉन्च सेंटर का नाम बदलकर प्रो. सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र करके सतीश धवन जी को देश ने श्रद्धांजलि दी